सुनो द्रौपदी शस्त्र उठालो,
अब गोविंद ना आएंगे।
छोडो मेहँदी खड्ग संभालो
खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि,
मस्तक सब बिक जायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो,
अब गोविंद ना आयेंगे|
कब तक आस लगाओगी तुम,
बिक़े हुए अखबारों से??
कैसी रक्षा मांग रही हो
दुःशासन दरबारों से??
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो
अब गोविंद ना आयंगे|
कल तक केवल अँधा राजा,
अब गूंगा बहरा भी है
होठ सिल दिए हैं जनता के,
कानों पर पहरा भी है|
तुम्हीं कहो ये अश्रु तुम्हारे,
किसको क्या समझायेंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो,
अब गोविंद ना आयंगे
◆रचना- पंडित पुष्यमित्र उपाध्याय
◆फ़ोटो- रुचि पाठक(इंडियन मिलिट्री फ़ोर्स)


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